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    Jayanti special : श्री गुरुनानक देव जी जनमदीन दिहाड़ा , गुरुनानक जयंती 8 नवम्बर, 2022 पर विशेष ‘सतगुरु नानक प्रगटिया मिट्टी धुंध जग चानण होआ’

      



    ‘जग तारण गुरु नानक आया।’ सिक्ख धर्म के संस्थापक व प्रथम गुरु गुरुनानक देव एक महान सन्त, अध्यात्मिक गुरु, मानवता के अग्रदूत, समाज सुधारक व धार्मिक एकता के पुजारी थे। उनका जन्म मेहता कालू जी व माता तृप्ता देवी के घर तलवण्डी गांव में हुआ था, जो आजकल ‘ननकाना साहब’ के नाम से जाना जाता है। गुरुनानक देव बचपन से ही अत्यंत प्रतिभावान, गम्भीर व शांत स्वभाव के थे तथा मौन रहकर प्रभु ध्यान में मगन रहते थे। उनके पिता मेहता कालू जी, जो एक पटवारी थे व खेती-बाड़ी करते थे, 

    उन्होंने बालक नानक को पंजाबी, हिन्दी, संस्कृत व फारसी की शिक्षा दिलवाई, परन्तु उनका मन सांसारिक ज्ञान की अपेक्षा अध्यात्मिक सत्संग व ईश्वर चिन्तन की ओर रहता था। नानक कहते थे मैं ऐसी विधा पढऩा चाहता हूँ, जिससे मैं अपने आपको जान सकूं। उनके अध्यापक व बाल सखा नानक के स्वभाविक आत्मज्ञान, उनकी भक्ति व विचारों से आश्चर्यचकित हो जाते थे। उस काल में अंधविश्वास व धार्मिक आडम्बर का बोलबाला था। 

    गुरुनानक इन सबके विरोधी थे। जब नानक को जनेऊ धारण करने के लिए कहा गया तो उन्होंने कहा कि ‘दया कपाह संतोख सूत जत गंढ़ी सत वट। इह जनेऊ जीअ का हई ता पांडे घत। न इह तुटे न मल लगै न इह जले न जाए। धन सु माणस नानका जो गल चले पाये।’ अर्थात् ऐसा जनेऊ कभी न टूट सके, न सिर्फ अग्नि जला सके, वह जनेऊ पहनना चाहता हूँ और जनेऊ पहनने से इन्कार कर दिया। जब नानक को उनके पिता ने गायों के चराने के लिए भेजा तो वे जंगल में पेड़ के नीचे ईश्वर चिंतन में खो जाते थे व पशु चराते हुए आगे निकल जाते थे।

    एक बार पिता ने उन्हें बीस रूपये देकर लाभ का सौदा करने के लिए भेजा, तो उन्होंने सारे रूपयों से साधु-संतों को भोजन करवा दिया और घर आकर पिता से कहा कि मैं सच्चा सौदा करके आया हूँ, तो पिता बहुत नाराज हुए व उन्हें बहन नानकी के पास सुलतानपुर काम के लिए भेज दिया। नानक ने दौलत खाँ मोदीखाने में काम शुरू किया तथा सामान तोलते समय तेरा ही तेरा है, कहकर तोलते रहे। इस प्रकार घाटा होने पर दौलत खाँ बहुत नाराज हुए। पिता कालूराम ने नानक के रंग-ढंग देखकर उनका विवाह सुलक्षणी जी के साथ कर दिया, जिससे उनके दो पुत्र श्रीचंद व लक्ष्मीचंद पैदा हुए। गुरुनानक का मन गृहस्थ जीवन में नहीं लगता था और वे अपने परम शिष्य मरदाना के साथ गीत गाते थे तथा मरदाना रबाब बजाता था। 

    इस प्रकार गुरुनानक देव गृहस्थ जीवन को छोडक़र लंका, मक्का, मदीना, बगदाद व वर्मा में 25 वर्ष तक भ्रमण कर उन्हें धार्मिक उपदेश देते रहे। भजन-उपदेशों में उन्होंने ‘एक  ओंकार’ व ‘करतार’ शब्द का प्रयोग किया तथा कहा कि ईश्वर एक है व सब जगह मौजूद है। ईश्वर हम सब का पिता है, जो अविनाशी है। उनकी वाणी में जादू था तथा उनके उपदेशों में सभी धर्मों व मजहबों का सार मौजूद था। नानक जी के बारे में कहा गया है कि ‘सतगुरु नानक प्रगटिया मिट्टी धुंध जग चानण होआ।’ अर्थात् गुरुनानक देव अज्ञानता का अंधकार मिटाने, ज्ञान का प्रकाश फैलाने तथा धर्म का मार्ग दिखाने के लिए संसार में आये थे। गुरुनानक देव कहते थे - ‘नाम जपो, कीरत करो, वंड छको’, ईमानदारी से काम करो, परमात्मा का सिमरन हर वक्त करते रहो, जरूरतमंद की सहायता करो, लोभ का त्याग करो, प्रेम व एकता के साथ जीवन व्यतीत करो तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकार पर विजय प्राप्त करने के लिए परमपिता परमात्मा, वाहेगुरु का निरन्तर जाप करो, इससे मुक्ति मिलेगी। ‘काम, क्रोध, तृष्णा गई, नानक प्रभ कृपा मई।’

    गुरुनानक देव ने साम्प्रदायिकता बढ़ाने वाली प्रवृत्ति व बाहरी आडम्बरों का डटकर विरोध किया तथा सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किये। उन्होंने मूर्ति पूजा का विरोध किया व गुरु भक्ति पर बल दिया। उनके अनुसार ‘कलयुग में एक नाम अधार, नानक बोले ब्रह्म विचार’ द्वारा प्रभु के नाम की महिमा का बखान किया। उन्होंने अपने भ्रमण काल में अनेकों कोतक दिखाये।

    नानक देव जी की भ्रमण यात्राओं को उदासियां कहा जाता है। गुरुनानक देव ने अपने भ्रमणकाल में ‘जपजी साहब’, ‘किरतनी आसां दी वार’, ‘बारह माह’ आदि वाणियों की रचना की। गुरुजी के उपदेश व शिक्षाऐं गुरु ग्रंथ साहब में संग्रहित है। गुरुनानक देव ने अपनी गद्दी अपने परम शिष्य ‘लहिणा’ को सौंपी, जो बाद में गुरु ‘अंगद देव’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।

    गुरुनानक देव के बारे में कहा गया है - ‘बाबा नानक शाह फकीर, हिन्दु का गुरु, मुसलमान का पीर।’ उन्होंने शिक्षाओं द्वारा हिन्दु व मुसलमान दोनों धर्मों के आधारभूत सिद्धांतों को संजोया। 70 वर्ष की आयु में 1539 में गुरुनानक देव करतारपुर में ज्योति ज्योत समा गए। गुरुनानक देव के ज्योति ज्योत समाने पर उनके पार्थिव शरीर पर हिन्दु व मुसलमान दोनों ने अपना अधिकार जताया, परन्तु उनकी मृत देह से जब चादर हटाई गई तो पार्थिव शरीर के स्थान पर सुंदर फूलों का ढेर देखकर सभी आश्चर्यचकित रह गये। हिन्दुओं ने आधा वस्त्र लेकर दाह संस्कार किया तथाा आधे वस्त्र से मुसलमानों ने उनकी कब्र बनाई। डेरा बाबा गुरुद्वारे में गुरु नानक देव का चोगा आज तक सुरक्षित है, जिस पर कुरान की आयतें लिखी हुई है।

    ऐसे महान संत अध्यात्मिक गुरु, जिन्होंने सीधी सरल भाषा व शैली में सभी धर्मों को समझाने का प्रयास किया है। गुरु का उपदेश सभी वर्णों के लिए सांझा है। गुरुनानक देव के उपदेशों-संदेशों व शिक्षाओं को जीवन में अपनाने व उतारने की आवश्यकता है। गुरुनानक देव की जयंती गुरु पर्व के रूप में मनाई जाती है। इस दिन श्रद्धालु गुरुद्वारों में सजावट करते हैं। नगर कीर्तन व शोभा यात्रा निकाली जाती है। गुरु ग्रंथ साहब के पाठों का भोग व गुरु का अटूट लंगर तथा प्रसाद ‘जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल’ तथा ‘सतिनाम वाहिगुरु’ का जयकारा करते हुए संगत में वितरित किया जाता है एवं सभी देशवासियों के लिए अमन-चैन खुशहाली के लिए अरदास की जाती है। सभी देशवासियों को गुरुनानक देव के प्रकाश पर्व की लख-लख बधाई हो।

    मनीराम सेतिया सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य 109-एल ब्लॉक, श्रीगंगानगर मो.नं. 98871-22040   

     

     


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